19/10/2021
HIMACHAL PARDESH

कृष्णवंश के 122वें राजा थे वीरभद्र सिंह-राजा वीरभद्र सिंह तो चले गए, लेकिन पीछे रह गई उनकी यादें।

राजनीति के एक युग का अंत, पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन से हिमाचल में शोक की लहर
कांग्रेस के दिग्गज नेता पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन से हिमाचल में शोक की लहर, राज्य से छिना लोकप्रिय लीडर

पूर्व मुख्यमंत्री राजा वीरभद्र सिंह लाखों लोगों को रोता-बिलखता छोड़ गए। उन्होंने अपनों का हाथ तो कभी छोड़ा ही नहीं, उस पर बेगानों को भी अपना मुरीद बना लिया…

प्रदेश में जहां से आई डिमांड वहीं खोल दिए स्कूल-कालेज

राज्य में शिक्षा का विकास वीरभद्र सिंह की देन

हिमाचल में जब-जब शिक्षा का नाम आएगा, तब-तब राजा वीरभद्र का नाम इतिहास में जोड़ा जाएगा। प्रदेश में शिक्षा का विकास अगर हुआ है, तो वो राजा वीरभद्र की देन है। शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार राज्य में 18 हजार के करीब सरकारी स्कूल है, इसमें से 90 प्रतिशत स्कूल वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में खोले गए हैं। उन्होंने स्कूल व कालेज खोलने के लिए सभी नियमों को भी तोड़ दिया। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह बताया जा रहा वो ग्रामीण क्षेत्रों में भी हर छात्र तक प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा मुहैया करवाना चाहते थे। यही वजह है कि जब भी वो किसी क्षेत्र में दौरे के लिए जाते थे, तो लोगों की मांगों पर वहां स्कूल या कालेज खोलने की घोषणा कर देते है-तब चाहे उस क्षेत्र में एक या पांच से भी कम छात्र क्यों न हो। स्कूल व कालेज खोलने की उनकी इन घोषणाओं की वजह से कई बार विपक्ष के साथ उनकी नोक झोंक भी होती थी, लेकिन इन सभी को दरकिनार कर वो छात्रों को सुविधा देने के लिए स्कूल कालेज खोल देते थे। यही वजह है कि आज अगर शिक्षा के स्तर पर पूरे देश में हिमाचल केरल के बाद दूसरे नंबर पर आता है, तो इसके पीछे राजा साहब का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी ऐसे की पूरी

बता दें कि वीरभद्र सिंह ने एजुकेशन सिस्टम को मजबूत बनाने के लिए ग्रामीण व जनजातीय क्षेत्रों में स्कूल तो खोल दिए, लेकिन वहां पर शिक्षकों को भेजना चुनौती से कम नहीं था। ऐसे में राजा वीरभद्र सिंह ने अपने कार्यकाल में पैरा टीचर की भर्ती शुरू की। 2003 में पैरा के तहत 2000 से ज्यादा शिक्षकों को रखा। उन शिक्षकों को ग्रामीण व जनजातीय क्षेत्रों में तैनाती दी।

जो कहते थे, वह कर दिखाते थे

धर्मशाला में विधानसभा का निर्माण कर भेदभाव के आरोप किए दूर

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह निर्णय लेने और उन्हें हकीकत में बदलने के लिए जाने जाते रहे हैं। राजाओं की तरह वह जो कह देते थे उसे करके ही दम लेते थे। अपर हिमाचल से संबंध रखने वाले वीरभद्र सिंह पर जब निचले हिमाचल से भेदभाव करने के आरोप लगे तो उन्होंने वह कर दिखाया जो और कोई नहीं कर पाया। कांगड़ा सहित निचले हिमाचल के कई नेता उनके खिलाफ माहौल बना कर सुर्खियां बटोरने लगे तो वीरभद्र सिंह ने कांगड़ा जिला के धर्मशाला में विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुरू करने का ऐलान कर दिया। इसे मूर्त रूप देना अधिकारियों के समक्ष बड़ी चुनौती थी, लेकिन राजा ने जो कह दिया वह कह दिया। जब स्थान नहीं मिला और वीरभद्र सिंह ने कहा कि तुरंत सत्र शुरू करना है कि 2005 में धर्मशाला कालेज के प्रयास भवन में ही विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुरू कर दिया, जिसे देख हर कोई हैरान था। उनके लिए गए निर्णयों में जिला कांगड़ा के धर्मशाला के तपोवन में विधानसभा का सत्र शुरू किए जाने का निर्णय भी रहा था। पहले पहल जब यह निर्णय लिया गया तो उसे पूरा भी किया गया। 16 मई, 2005 को तपोवन में विधानसभा भवन के निर्माण का कार्य भी शरू हो गया।

सचिवालय में बिठाए मंत्री

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने धर्मशाला को दूसरी राजधानी बनाने को लेकर भी बड़ा कदम उठाया था। उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल में बाकायदा इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी थी। उस समय के विपक्षी दल भाजपा ने इसे मात्र दस पैसे के कागज पर अधिसूचना जारी करने की बात की थी। वीरभद्र सिंह ने जिला कांगड़ा के सियासी महत्त्व को भली भांति जानते व समझते थे। वीरभद्र सिंह ने सचिवालय में स्वयं ही नहीं मंत्रियों को भी बारी-बारी बैठने के आदेश जारी कर धर्मशाला से सरकार चलाने का क्रम शुरू किया था

भरमौर-पांगी का बदल दिया नक्शा

चंबा के जनजातीय क्षेत्रों में पूर्व सीएम ने बहाई विकास की गंगा…

देश के पिछडे़ जिलों की सूची में शुमार जिला चंबा के प्रति पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह का गहरा लगाव था। जिला के विभिन्न उपमंडलों के अलावा जनजातीय क्षेत्र भरमौर व पांगी में विकास की अधिकतर योजनाएं पूर्व मुख्यमंत्री की देन है। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान बिना किसी क्षेत्रीय भेदभाव के समान विकास को प्राथमिकता दी। इस कार्यप्रणाली के चलते पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह आज भी लोगों के दिलों में राज करते हैं। चंबा में मेडिकल व पोलिटेक्निकल कालेज पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की देन है। इसके विभिन्न उपमंडलों व तहसील मुख्यालयों में डिग्री कालेज और सैकड़ों प्राथमिक, माध्यमिक व वरिष्ठ माध्यमिक पाठशालाएं भी खोली हैं। जिला में सडकों के नेटवर्क को मजबूत करने और पुलों का निर्माण किया है।

…शायद ही कोई और ऐसा बन पाएगा

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का राष्ट्र और सचिन तेंदुलकर का अंतरराष्ट्रीय किक्रेट में जो स्थान है, हिमाचल की राजनीति में राजा वीरभद्र सिंह का भी वहीं स्थान है। मुझे यूपीए-दो सरकार के समय श्री वीरभद्र सिंह के साथ कार्य करने का मौका मिला। उस समय श्री सिंह केंद्र की मनमोहन सरकार में केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्री थे। बहुत उद्धार ह्दय और स्पष्टवादी इनसान थे। उनके शब्दों में कोई घोल नहीं होता था। चूंकि मैं एक पत्रकार हूं इसलिए उन्हें बहुत अच्छे से जानता था। और जब 2009 से 2013 तक मैंने उनके मीडिया सलाहकार के रूप में कार्य किया इसलिए उन्हें हर तरह से गहराई से जानने का मौका मिला। मुद्दों की समझने की क्षमता उनमें थी, किसी और में नहीं देखी। दिल्ली से लेकर हिमाचल तक केंद्र और राज्य की राजनीति में जो पैठ उन्होंने बनाई शायद ही कोई और नेता बना पाएगा। सुबह से शाम तक हर गतिविधि इतनी अनुशासनीयता थी कि हर कोई दाद देता है। प्रदेश के लिए जो बढ़े संस्थान, स्कूल, कालेज या हर विधानसभा क्षेत्र में सभी विभागों के उपमंडल स्तरीय कार्यालय खुले, सब राजा साहब की देन है। वह बहुत कुशल प्रशासक थे, बावजूद इसके उन पर सत्ता के केंद्रीय के आरोप लगे पर हर बार उसका जवाब बेहतरीन कार्यों के साथ दिया। राजा अवस्थी

शिमला से धर्मशाला लाए शिक्षा बोर्ड

अपर शिमला में विरोध के बाद भी अपने फैसले पर रहे अडिग

प्रदेश की राजनीति के धुरंधर और आधुनिक हिमाचल के विकास के कर्णधार रहे पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा के विकास में अहम योगदान रहा है। हिमाचल के छह बार मुख्यमंत्री होने का गौरव पाने वाले वीरभद्र सिंह ने निचले हिमाचल में खासकर कांगड़ा जिला को काफी अहमियत दी। कांगड़ा की बात करें तो वीरभद्र के अपने मुख्यमंत्री काल के दौरान यहां सबसे पहले स्कूल शिक्षा बोर्ड के मुख्यालय को शिमला से जिला मुख्यालय धर्मशाला में स्थानातंरित करना बड़ा निर्णय था। हालांकि उस दौरान ऊपरी हिमाचल के लोगों ने इस पर विरोध दर्ज करवाया, लेकिन अपने निर्णयों को लेकर अडिग रहने वाले वीरभद्र सिंह ने इसकी परवाह किए बगैर इस संस्थान को धर्मशाला में स्थापित करवाया। स्कूल शिक्षा बोर्ड के धर्मशाला में खुलने से निचले हिमाचल के साथ ही चंबा जिला के दूरदराज क्षेत्रों के लोगों को एक बड़ी राहत मिली, जिन्हें पहले शिमला की दौड़ लगानी पड़ती थी। इसी तरह कांगड़ा के मुख्यालय धर्मशाला में नोर्थ रेंज के बड़े कार्यालय जैसे जलशक्ति विभाग, पीडब्ल्यूडी, बिजली बोर्ड व पुलिस के डीआईजी कार्यालय खोलने का काम भी वीरभद्र सिंह की सरकार ने किया था। इन कार्यालयों के खुलने से निचले हिमाचल के लोगों को बड़ी राहत मिली थी।

बिलासपुर पर हमेशा ही रहे दरियादिल

जिला में एम्स-सीमेंट फैक्टरी पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की देन, 80 प्रतिशत स्कूल किए अपग्रेड

हिमाचल की राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी छह बार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह के बिलासपुर के लिए दिए गए योगदान को भूलाया नहीं जा सकता। वीरभद्र सिंह की बदौलत इस जिला के खाते में कई छोटे-बड़े प्रोजेक्ट आए हैं। केंद्र से हिमाचल के लिए स्वीकृत एम्स जैसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान के लिए कोठीपुरा में जमीन चयन की प्रक्रिया को वीरभद्र सिंह ने गंभीरता दिखाते हुए मुख्यमंत्री रहते हुए सिरे चढ़ाया। नयनादेवी के विधायक एवं पूर्व मंत्री रामलाल ठाकुर उनके खास सिपेहसालारों में से एक रहे हैं, जबकि पूर्व विधायक बंबर ठाकुर, तिलकराज शर्मा, डा. बीरूराम किशोर, कश्मीर सिंह ठाकुर इत्यादि भी खास थे। यही नहीं, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ भी उनके मधुर संबंध रहे हैं। वीरभद्र सिंह की पहाड़ और तराई के साथ-साथ जातिगत सोशल इंजीनियरिंग गजब थी।

विधायक रामलाल ठाकुर ने बताया कि 1985 से लेकर भाखड़ा विस्थापितों के लिए मिनी सेटलमेंट, बिलासपुर में सेशन कोर्ट खुलवाना, मत्स्य निदेशालय, दयोली मत्स्य प्रजनन फार्म, लूहणू का खेल परिसर, वाटर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स और पैराग्लाइडिंग के लिए उनके प्रयासों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसके अलावा जिला बिलासपुर में 80 प्रतिशत से ज्यादा स्कूलों और कालेजों के अपग्रेडेशन वीरभद्र सिंह की देन है। वहीं, एसीसी सीमेंट फैक्टरी में इनका योगदान रहा जिसके कारण बिलासपुर की आर्थिकी बढ़ी तो वहीं, औद्योगिक क्षेत्र बिलासपुर व ग्वालथाई भी वीरभद्र सिंह की देन हैं। वीरभद्र सिंह की सरकार ने अपनी 26 दिसंबर, 2014 की कैबिनेट मीटिंग में एम्स जैसे स्वास्थ्य संस्थान को बिलासपुर के कोठीपुरा में खोलने का निर्णय लिया था।

भाजपा ने भी दी श्रद्धांजलि

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन पर जिला में शोक की लहर है। कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भाजपा ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। कांग्रेस न पूर्व विधायक राजेश धर्माणी की अगवाई में शोक सभा का आयोजन किया।

स्थगित किए कार्यक्रम

कांग्रेस की जिलाध्यक्ष अंजना धीमान ने पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है । उन्होंने बताया कि अगले तीन दिन के लिए कांग्रेस के प्रस्तावित कार्यक्रमों को स्थगित कर दिया गया है।

74 साल पहले रोपे पौधे की छांव में समस्याएं सुनते थे वीरभद्र सिंह

राजा वीरभद्र सिंह तो चले गए, लेकिन पीछे रह गई उनकी यादें। उन्हीं यादों में से एक खास याद है यह है कि शिमला उनके निवास स्थान होलीलॉज में 15 अगस्त, 1947 को उन्होंने एक पौधा लगाया था, जो आज एक विशाल पेड़ बन गया है। बता दें कि इस विशाल पेड़ को 74 साल हो चुके हैं। इस पेड़ से राजा वीरभद्र सिंह की काफी यादें जुड़ी है। वह अकसर इस पेंड की छांव में बैठ कर अपना समय बिताते थे। होलीलॉज में यह आज इतना विशाल हो गया है कि तपती धूप में हर किसी को अपनी राहत भरी छांव देता है। वीरभ्रद सिंह का भी किरदार ऐसा ही था। वह भी अपनी प्रजा को हमेशा ध्यान रखते थे। उनकी समस्याओं को सुनते थे और उनका उचित समाधान भी करते थे। 15 अगस्त, 1947 स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उनके द्वारा इस पौधे को लगाया गया था। उस समय वह शिमला के विशब कॉटन स्कू ल में पढ़ाई करते थे। वह उस समय 13 साल के थे।

होली लॉज में माहौल गमगीन

बेटे विक्रमादित्य सिंह को नसीहत राजा साहब से ज्यादा करना नाम रोशन

होलीलॉज में गुरुवार से ही माहौल गमगीन बना रहा। लोग वीरभद्र सिंह के अंतिम दर्शनों के लिए पहुंचते रहे। कई बुजुर्ग महिलाआें समेत पुरुष भी उन्हें पुष्प अर्र्पित करने के लिए पहुंचे। इसी दौरान एक बुजुर्ग ने स्व. पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य के पास आता है और बोलता है कि बेटा अब तुम्हे राजा साहब से ज्यादा अपना नाम रोशन करना है। ये क्षण काफी गमगीन था।

असल छाया तो छिन गई, अब पेड़ की छाया ही लेनी पड़ेगी

दोपहर के समय शिमला में काफी तेज धूप पड़ रही है। होलीलॉज में भी इसी तरह का नजारा था। लोग धूप से बचने के लिए छांव देख रहे थे। तभी कुछ लोग लॉन की और जा रहे थे। आपस में बात कर रहे थे गर्मी ज्यादा है और छांव देखते हैं, वहां पर बैठते हैं। इतने में इनके बीच से एक शख्स बोलता है कि असल छाया तो छिन गई, अब तो केवल पेड़ की ही छाया लेनी पड़ेगी

चैन की नींद सोया हिमाचल का शेर

होलीलॉज के गेट के अंदर जाते ही घर के अंदर जाने के लिए एक मेन एंट्रेस है। यहां पर बाहर बैठने के लिए बैंच लगाया गया है। यहां पर भी काफी संख्या में बुजुर्ग खड़े हुए थे। सभी रामपुर या आसपास के इलाकों से आए थे। कई बुजुर्ग अंदर जा रहे थे। एक-दूसरे को ढांढस बंधा रहे थे। तभी एक बुजुर्ग बोलता है कि आज हिमाचल का शेर चैन की नींद सो गया।

होलीलॉज से गए खुशियों के दिन

पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के निधन पर भारी संख्या में लोगों के होलीलॉज पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। विभिन्न जगहों से लोग यहां पर उनके अंतिम दर्शनों के लिए पहुंचते रहे। इसी दौरान लोग आपस में बाते करते हुए जा रहे थे कि कैसे दिन आ गया। आज यहां पर हमे शोक मनाने के लिए आना पड़ रहा है। आज से पहले जब भी यहां पर आए तो केवल खुशी मनाने आते थे। अब ऐसे दिन नहीं आएंगे।

कभी किसी से मिलने को मना नहीं किया

शिमला। पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह अकसर होली लॉज के लॉन पर बैठे रहते थे और उनसे मिलने आने वाले लोगों से बाते करते रहते थे। रोजाना हजारों की संख्या में लोग उनसे मिलने यहां पर पहुंचते थे। वीरभद्र सिंह भी किसी को मिलने से मना नहीं करते थे। यही वजह है कि बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक उनको जानता है। ऐसे में लॉन में भी अब सन्नाटा छाया रहेगा और अब शायद ही इनसे मिलने वाले यहां पहुंच पाए।

प्रदेश के दिग्गज नेता थे राजा साहब

पालमपुर। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का निधन हिमाचल प्रदेश में एक राजनीतिक युग की समाप्ति है। लंबे समय तक वे हिमाचल प्रदेश की राजनीति पर लगभग छाए रहे। कई बार मुख्यमंत्री बने और कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व किया। हिमाचल की राजनीति की पहली पीढ़ी के वे एक दिग्गज नेता थे। एक कुशल प्रशासक और रचनात्मक राजनीति करने वाले मधुरभाषी नेता थे।

हर छोटी-छोटी हरकत पर नजर

कालेज के उद्घाटन समारोह में आते ही प्रिंसीपल को बताया, बोर्ड सही नहीं है…

पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह की काम के प्रति समर्पितता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है जब वह मुख्यालय के नए कालेज भवन के उद्घाटन समारोह पर पहुंचे, तो वहां डिग्री कालेज का बोर्ड लगा देख नीचे उतर गए। उन्होंने कालेज की प्रिंसीपल को बुलाकर कहा कि यह बोर्ड सही नहीं है। यह डिग्री कालेज नहीं बल्कि पोस्ट ग्रेज्युएट कालेज है। इससे पता चलता है कि वह छोटी- छोटी चीजों का कितना ध्यान रखते थे।

कालेज के पास से मौके पर शिफ्ट किया प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का भवन

पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह ने एक बार सुल्तानपुर में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कार्यालय के उद्घाटन समारोह के दौरान भी मौके पर निर्माण स्थल को बदलने की बात कहकर सबको चौंका दिया था। हुआ यूं कि उन्होंने कालेज भवन के साथ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के भवन की आधारशिला रखी। मगर उन्हें पता चला कि साथ में कालेज है, तो उन्होंने कहा कि यहां इस भवन का निर्माण नहीं होगा। इसके बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कार्यालय को राजपुरा शिफ्ट कर दिया गया।

पांगी के ट्रांसफर आर्डर रद्द करने के लिए कहने पर भड़क उठे वीरभद्र सिंह

पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह की जनजातीय क्षेत्र पांगी के प्रति लगाव का एक किस्सा आज भी लोगों के जहन में है। मिंजर मेला के समापन मौके पर चंबा पधारने पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह परिधि गृह में लोगों की समस्याएं सुन रहे थे। इसी दौरान एक व्यक्ति ने तबादला आदेश रद्द करने का प्रार्थना पत्र सौंपा। पूर्व सीएम ने पूछा कि आपका तबादला कहां हुआ है, तो उसने कहा कि पांगी। इतना सुनते ही वह अपनी कुर्सी से खड़े हो गए। उन्होंने व्यक्ति को कहा कि वह इस कुर्सी पर बैठ जाए वह पांगी चले जाते हैं। व्यक्ति को झाड़ते हुए कहा कि आपने पांगी को क्या समझ रखा है।

इंदिरा गांधी ने सीएम बनाकर खेला था दांव, छह बार मुख्यमंत्री बनकर वीरभद्र सिंह ने रचा इतिहास

लगातार दो बार और कुल छह बार मुख्यमंत्री बनकर वीरभद्र सिंह ने रचा इतिहास
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चहेते बन चुके वीरभद्र सिंह पर आलाकमान ने ठाकुर रामलाल को हटाकर बड़ा दांव खेला था। उस दौरान कांग्रेस की सरकार घोटालों के दौर से गुजर रही थी। इसके चलते वर्ष 1983 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ठाकुर रामलाल से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा लेकर वीरभद्र सिंह की ताजपोशी की गई थी। इंदिरा गांधी ने चौथी बार सांसद बने वीरभद्र सिंह को दिल्ली से सीधे हिमाचल भेजकर मुख्यमंत्री बनाया था। इसके बाद हिमाचल के इस फाइटर नेता ने मुड़कर वापस नहीं देखा। मुख्यमंत्री बदलने के महज दो सालों बाद राज्य में विधासनभा के आम चुनाव थे। अपनी काबिलीयत का लोहा मनवाने निकले वीरभद्र सिंह ने वष 1985 के चुनावों में अपने दम पर कांग्रेस को जीत दिलवाकर दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड बना लिया।

हालांकि वर्ष 1990 में भाजपा सत्ता में काबिज हो गई, लेकिन अढ़ाई साल के भीतर शांता कुमार की सरकार को सत्ता से बेदखल कर वर्ष 1993 में तीसरी बार उन्होंने सीएम की कुर्सी काबिज कर ली। पांच साल बाद प्रदेश में विकास का अलख जगाने के बाद वर्ष 1998 में प्रदेश के चौथी बार मुख्यमंत्री बन गए। हालांकि ट्राइबल की तीन सीटों के लटके चुनावों के कारण निर्दलीय विधायक रमेश ध्वाला ने सियासी समीकरण बिगाड़ दिए। इसके चलते कुछ दिन बाद वीरभद्र सिंह को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और धूमलराज का युग शुरू हो गया। पांच साल बाद वर्ष 2003 में आयोजित आम चुनावों में वीरभद्र सिंह का मैजिक पूरे प्रदेश में छाया। इस बार धूमल सरकार को बाहर का रास्ता दिखाकर वीरभद्र सिंह ने पार्टी के लिए धमाकेदार जीत के साथ पांचवी बार मुख्यमंत्री पद संभाला। इसके बाद वर्ष 2012 में वह छठी बार हिमाचल के मुख्यमंत्री बने।

दो बार केंद्रीय हाइकमान को भी झुकाया

फाइटर और स्टाइलिस्ट छवि वाले वीरभद्र सिंह के आगे दो बार केंद्रीय हाइकमान भी झुका। वर्ष 1993 में विरोधी नेताओं ने सुखराम सिंह को आगे लाने के लिए वीरभद्र सिंह को धकेलने का पूरा प्रयास किया। इसी तरह वर्ष 2012 में भी विरोधी नेता एक जुट होकर वीरभद्र सिंह को हाशिये पर लाने में प्रयासरत रहे। दोनों ही बार अपने समर्थकों के दम पर सत्ता में वापसी की और केंद्रीय हाइकमान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। खासकर शरद पवार की पार्टी में शामिल होने की वीरभद्र सिंह की गुपचुप धमकी से केंद्रीय हाइकमान के हाथ पांव फूल गए। इस कारण विरोधी कभी भी उनके सामने नहीं टिक पाए।

कृष्णवंश के 122वें राजा थे वीरभद्र सिंह

राजा वीरभद्र सिंह कृष्णवंश के 122वें राजा थे। सराहन का पुराना नाम शोणितपुर था। यह बाणासुर की राजधानी थी। बाणासुर भक्त प्रह्लाद के पुत्र बलि राजा के सौ पुत्रों में से सबसे बड़ा था। उसने अपने राज्य की बागडोर श्रीकृष्ण के पुत्र एवं अनिरुद्ध के पिता प्रद्युमन को सौंपी थी। प्रद्युमन शोणितपुर का प्रथम राजा बना। राजा छत्र सिंह के समय बुशहर की राजधानी स्थायी रूप से कामरू से सराहन स्थानांतरित हुई। सन 1550 के आसपास राजा राम सिंह ने ही सराहन से अपनी राजधानी रामपुर लाई थी और उनके नाम से ही यहां का नाम रामपुर पड़ा। इसके बाद राज परिवार रामपुर में रहने लगा।

इसी परिवार में 23 जून, 1934 को वीरभद्र सिंह का जन्म हुआ। उनकी शुरुआती पढ़ाई रामपुर में ही हुई। जिसके बाद उन्होंने बिशप कॉटन स्कूल शिमला में शिक्षा ली। यहां से वह अपनी आगामी पढ़ाई करने के लिए दिल्ली चले गए। जहां पर उन्होंने बीए आनर्स की पढ़ाई की। वहां से वह वापस हिमाचल आए। दिल में उनकी यही ख्वाहिश थी कि वह शिक्षक बनें, लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था

वो वीर भी थे और भद्र भी

सियासत में कभी भी पिसने नहीं दिया हमीरपुर का विकास

राज+नीति अर्थात राजनीति। राज मतलब शासन और नीति मतलब उचित समय और उचित स्थान पर उचित कार्य करने कि कला। यही कला थी शायद पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह में जो प्रदेश के लाखों लोगों को रोता-बिलखता छोड़ गए। उन्होंने अपनों का हाथ तो कभी छोड़ा नहीं, लेकिन बेगानों को भी अपना मुरीद बनाया। जिला हमीरपुर के साथ भी स्व. वीरभद्र सिंह की कुछ ऐसी ही कहानी रही। राजनीति का केंद्र और भाजपा का गढ़ कहे जाने वाले इस जिले और यहां के लोगों को भी वीरभद्र सिंह ने अपना मुरीद बनाया। हमीरपुर राजनीति का केंद्र इसलिए रहा क्योंकि यहां से प्रदेश के दो बार भाजपा समर्थित मुख्यमंत्री रहे और कांग्रेस का ही एक समानांतर ग्रुप यहां शुरू से ही सक्रिय रहा। भाजपा का गढ़ इसलिए क्योंकि यहां चाहे लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव कांग्रेस खुद को प्रूव नहीं पाई। खैर उसकी बहुत सारी वजहें रहीं लेकिन वीरभद्र सिंह ने मुख्यमंत्री रहते हुए इस जिले के विकास से कभी हाथ पीछे नहीं खींचे। फिर बात चाहे आरईसी (रीजनल इंजीनियरिंग कालेज) जो वर्तमान में एनआईटी (नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) है की स्थापना की हो या फिर बमसन-लगवाटी जैसी तत्कालीन प्रदेश की सबसे बड़ी पेयजल योजना की या फिर जिले के सब-डिवीजनों की स्थापना की, वीरभद्र सिंह से उनके समर्थकों ने जो मांगा वो उन्होंने दिया। बता आरईसी की करें तो बताते हैं कि पहले इस ऊना में खोले जाने की प्लानिंग थी क्योंकि वहां के लोग मुफ्त में जमीन देने के लिए राजी थे। वीरभद्र सिंह उस वक्त प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।

कहते हैं कि वीरभद्र चाहते थे कि आरईसी ऐसी जगह पर बने जो प्रदेश के केंद्र में हो, जहां से धौलाधार की पहाडिय़ां भी दिखती हों और प्रदेश के हर जिले का बच्चा वहां आसानी से पहुंच सके। इसलिए उन्होंने इसे वर्ष 1986 में हमीरपुर में स्थापित करवाया। इसी तरह 80 लाख से निर्मित बमसन-लगवालती पेयजल योजना को उन्होंने दस माह का रिकार्ड समय में निर्मित करवाया था। बताते हैं कि उस वक्त, बमसन और मेवा विधानसभा क्षेत्रों में पेयजल का भारी संकट होता था और एक ऐसी पेयजल योजना की जरूरत थी जो हजारों लोगों के लिए पानी मुहैया करवा सके। बताते हैं कि वीरभद्र सरकार का कार्यकाल 2007 में पूरा होना था इसलिए उन्होंने आईपीएच महकमे को निर्देश दिए थे कि इसे दस महीने में पूरा करना है और उन्हें हर सप्ताह अपडेट करना है कि कितना काम हुआ। आखिर महकमे ने भी दस माह में इस योजना का काम पूरा कर दिया था। इसी तरह जिला के सब-डिविजनों की स्थापना भी वीरभद्र सिंह की देन बताई जाती है। जिला के कई शिक्षण स्थानों की स्थापना और अपग्रेडेशन का श्रेय भी वीरभद्र सिंह को दिया जाता है। यानि वीरभद्र सिंह के राजनीतिक मतभेद भले ही रहे हों लेकिन उन्होंने कभी विकास कार्यों में इसे आगे नहीं आने दिया। उनके साथ जो लोग थे चाहे वो हारे या जीते, लेकिन उन्होंने कभी उनका साथ
नहीं छोड़ा।

 

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